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अमेरिका और इजराइल के बीच ईरान के खिलाफ चल रहा युद्ध इस साल की सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय घटनाओं में से एक है। आठ महीने से अधिक समय से होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) बंद होने के कारण इस संघर्ष का असर वैश्विक खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, समुद्री परिवहन और सुरक्षा गठबंधनों पर पड़ रहा है। इसका प्रभाव पश्चिम एशिया से आगे बढ़कर भारत सहित दुनिया के कई देशों तक पहुंच गया है।
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ऐसे अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों से संबंधित पैसेज आधारित प्रश्न कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट (CLAT 2027) में पूछे जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, रूस-यूक्रेन युद्ध से संबंधित प्रश्न पहले यूजी क्लैट 2022 और उसके बाद क्लैट पीजी 2023 में पूछे गए थे। इसी तरह ब्रिक्स (BRICS) और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन जैसे विषय भी क्लैट करेंट अफेयर्स का हिस्सा रहे हैं।
इसलिए क्लैट 2027 की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए ईरान युद्ध की पृष्ठभूमि, इसके कारणों, प्रमुख घटनाओं और भारत पर पड़ने वाले प्रभावों को समझना जरूरी है। इस लेख में अमेरिका-इजराइल और ईरान युद्ध से जुड़ी उन सभी महत्वपूर्ण जानकारियों को शामिल किया गया है, जो क्लैट 2027 की करेंट अफेयर्स और सामान्य ज्ञान की तैयारी के लिए उपयोगी हो सकती हैं।
अमेरिका और ईरान के संबंध कभी काफी अच्छे हुआ करते थे, लेकिन एक दशक के भीतर दोनों देशों के बीच गहरी दुश्मनी पैदा हो गई। वर्ष 1953 में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) और ब्रिटेन की एमआई6 (MI6) के समर्थन से हुए तख्तापलट में ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक को सत्ता से हटा दिया गया और शाह मोहम्मद रजा पहलवी की सत्ता बहाल कर दी गई।
1960 और 1970 के दशक में शाह अमेरिका के प्रमुख खाड़ी सहयोगी थे। ईरान अमेरिका से हथियार खरीदता था और अमेरिका ने ईरान के नागरिक परमाणु कार्यक्रम की शुरुआत में भी मदद की थी। शाह की 'श्वेत क्रांति' (White Revolution) के तहत ईरान का आधुनिकीकरण किया गया। हालांकि, उनका शासन गुप्त पुलिस संगठन सवाक (SAVAK) के माध्यम से विरोधियों के दमन और बढ़ती आर्थिक असमानता के लिए भी जाना जाता था।
शाह के शासन के खिलाफ असंतोष बढ़ता गया। धार्मिक नेताओं, छात्रों और व्यापारियों के नेतृत्व में वर्ष 1979 में इस्लामी क्रांति (Islamic Revolution) हुई। शाह को देश छोड़ना पड़ा और अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी ने इस्लामी गणराज्य (Islamic Republic) की स्थापना की।
नवंबर 1979 में ईरानी छात्रों ने तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर लिया और 52 अमेरिकी नागरिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा। इसके बाद अमेरिका ने 1980 में ईरान के साथ राजनयिक संबंध समाप्त कर दिए। तब से दोनों देशों के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं।
इसके बाद ईरान ने पश्चिम एशिया में इजराइल विरोधी संगठनों को समर्थन देना शुरू किया। दूसरी ओर, अमेरिका ने ईरान पर कई आर्थिक और राजनीतिक प्रतिबंध लगाए।
दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम सबसे बड़ा विवाद बन गया।
वर्ष 2015 में संयुक्त व्यापक कार्य योजना (Joint Comprehensive Plan of Action - JCPOA) नाम से परमाणु समझौता हुआ। इसके तहत ईरान ने अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम पर सीमाएं स्वीकार कीं और बदले में उसे आर्थिक प्रतिबंधों से राहत मिली।
हालांकि, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका वर्ष 2018 में इस समझौते से बाहर निकल गया। जून 2025 में इजराइल और ईरान के बीच 12 दिनों तक युद्ध चला, जिसमें अमेरिका भी कुछ समय के लिए शामिल हुआ। इसी घटनाक्रम ने मौजूदा संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार की।

अमेरिका और इजराइल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को हमले का प्रमुख कारण बताया। हालांकि, इस संघर्ष के पीछे पश्चिम एशिया में इजराइल और ईरान के बीच लंबे समय से जारी क्षेत्रीय और रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता भी है।
1. ईरान का परमाणु कार्यक्रम (Nuclear Programme): जून 2025 के हमलों से पहले अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के अनुमान के अनुसार, ईरान के पास लगभग 440.9 किलोग्राम यूरेनियम था, जिसे 60 प्रतिशत तक संवर्धित किया गया था। यह स्तर हथियार बनाने के लिए आवश्यक स्तर के काफी करीब है। यदि इसे और अधिक संवर्धित किया जाता, तो इससे लगभग 10 परमाणु हथियारों के लिए पर्याप्त सामग्री प्राप्त की जा सकती थी।
जून 2025 के युद्ध के बाद ईरान ने क्षतिग्रस्त परमाणु ठिकानों पर अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों की पहुंच रोक दी। इसलिए मौजूदा यूरेनियम भंडार की स्थिति स्पष्ट नहीं है। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। वहीं, युद्ध के आलोचकों का तर्क है कि परमाणु क्षमता होना और वास्तव में परमाणु हथियार बनाने की तैयारी करना दो अलग-अलग बातें हैं।
2. इजराइल और ईरान के बीच क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता: इजराइल ईरान को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है। दूसरी ओर, ईरान पश्चिम एशिया के कई देशों में सक्रिय सशस्त्र संगठनों को समर्थन देता है। इनमें लेबनान का हिजबुल्लाह (Hezbollah), यमन के हूती (Houthis), इराक के विभिन्न मिलिशिया समूह और गाजा का हमास (Hamas) शामिल हैं।
इनमें से अधिकतर संगठन शिया या शिया समर्थित हैं, जबकि हमास सुन्नी संगठन है। ईरान शिया बहुल देश है और सुन्नी बहुल सऊदी अरब के साथ उसका क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर लंबे समय से प्रतिस्पर्धा रही है।
3. अमेरिका और इजराइल का संयुक्त हमला: 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर संयुक्त सैन्य हमले शुरू किए। यह हमला ओमान द्वारा जिनेवा में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में महत्वपूर्ण प्रगति की घोषणा किए जाने के एक दिन बाद हुआ।
इजराइल ने इन हमलों को संभावित खतरे के खिलाफ पूर्व-निवारक कार्रवाई (Pre-emptive Strike) बताया। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि इसका उद्देश्य आसन्न खतरों को समाप्त करना है। उन्होंने ईरान के नागरिकों से इस्लामी गणराज्य की सरकार के खिलाफ खड़े होने की अपील भी की।
4. ईरान के शीर्ष नेताओं की मौत: युद्ध के पहले दिन ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई। वह 1989 से इस पद पर थे। उनके साथ वरिष्ठ सलाहकार अली शामखानी और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के प्रमुख जनरल मोहम्मद पाकपुर भी मारे गए। वर्तमान में मोजतबा खामेनेई ईरान के सर्वोच्च नेता हैं।
5. ईरान की जवाबी कार्रवाई: अमेरिका और इजराइल के हमलों के जवाब में ईरान ने इजराइल के साथ-साथ बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कुवैत, कतर और जॉर्डन में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। इसके अलावा, ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री आवाजाही लगभग बंद कर दी।
ईरान युद्ध का असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है। इससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, खाद्य सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और आर्थिक विकास प्रभावित हो रहे हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों महत्वपूर्ण है? (Why Strait of Hormuz Matters)
होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान और ओमान के बीच स्थित एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यह फारस की खाड़ी को अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्गों से जोड़ता है।
युद्ध से पहले दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता था। इसके अलावा, बड़ी मात्रा में तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) और उर्वरकों का परिवहन भी इसी रास्ते से होता है। फरवरी 2026 से ईरान ने इस मार्ग पर समुद्री आवाजाही को प्रभावी रूप से बाधित कर रखा है।
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है। खाड़ी देशों से होने वाली ऊर्जा आपूर्ति में होर्मुज जलडमरूमध्य की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसके बंद होने से भारत के सामने ऊर्जा और उर्वरक से जुड़ी चुनौतियां पैदा हो गई हैं।
1. ऊर्जा संकट (Energy Crisis): होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा आने से भारत में एलपीजी (LPG) और ईंधन की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसके साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से भारत का आयात बिल बढ़ सकता है।
2. उर्वरक की कमी (Fertiliser Shortage): भारत के उर्वरक उद्योग को खाड़ी देशों से प्राकृतिक गैस की आपूर्ति पर काफी निर्भर रहना पड़ता है। गैस की आपूर्ति प्रभावित होने से उर्वरक उत्पादन में कमी आ सकती है। इसका असर कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है।
3. भारत की कूटनीतिक स्थिति (India's Diplomatic Position): भारत इस संघर्ष में संतुलित कूटनीतिक रुख अपना रहा है। उसने किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करने के बजाय अमेरिका, इजराइल, ईरान और खाड़ी देशों के साथ बातचीत जारी रखी है।
भारत रूस जैसे अन्य देशों से तेल खरीदने के विकल्पों पर भी काम कर रहा है। साथ ही, भारतीय जहाजों की सुरक्षित समुद्री आवाजाही सुनिश्चित करने की मांग कर रहा है।
युद्ध के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) प्रभावित हुई है। यूरोप, चीन और दक्षिण एशिया के कई देशों को ऊर्जा की बढ़ती कीमतों का सामना करना पड़ रहा है।
तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि से परिवहन, उद्योग, कृषि और खाद्य उत्पादन की लागत बढ़ सकती है। इसका सीधा असर महंगाई और वैश्विक आर्थिक विकास पर पड़ता है।
ईरान युद्ध में आगे क्या होगा? (What Next?)
4 नवंबर 2026 तक युद्ध का कोई स्थायी समाधान या स्थिर युद्धविराम नहीं हुआ है। इस संघर्ष को रोकने के लिए कई बार बातचीत और युद्धविराम के प्रयास किए गए, लेकिन वे सफल नहीं हो सके।
7-8 अप्रैल 2026 को पाकिस्तान की मध्यस्थता में पहला युद्धविराम हुआ। यह दो सप्ताह के लिए था। हालांकि, इसके बाद अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य के मुहाने पर स्थित क़ेश्म द्वीप (Qeshm Island) पर कई बार हमले किए।
जून के मध्य में अमेरिका और ईरान के बीच 60 दिनों के एक समझौता ज्ञापन (Memorandum of Understanding - MoU) पर सहमति बनी। इसका उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलना था। हालांकि, जुलाई के मध्य तक यह समझौता विफल हो गया और अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी फिर से शुरू कर दी।
2 नवंबर 2026 को अमेरिका ने क़ेश्म द्वीप पर नए हमले किए। ये हमले कतर की मध्यस्थता में चल रही अप्रत्यक्ष बातचीत के दौरान हुए।
तारीख | प्रमुख घटनाक्रम |
2 नवंबर 2026 | ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स द्वारा अमेरिकी विमान पर गोलीबारी के बाद अमेरिका ने क़ेश्म द्वीप पर सीमित रक्षात्मक हमले किए। ट्रंप ने कहा कि समझौता संभव है। |
14 जुलाई 2026 | अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी फिर से शुरू की। ट्रंप ने जून के युद्धविराम को समाप्त घोषित किया। |
26-27 जून 2026 | अमेरिकी हमले गेरुक और क़ेश्म के आसपास हुए। ईरान ने बहरीन और कुवैत में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया। |
14-17 जून 2026 | 14 जून को समझौते की घोषणा हुई और 17 जून को होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। इसके बाद भी प्रतिदिन लगभग 28 जहाज ही इस मार्ग से गुजर पाए। |
2-3 जून 2026 | अमेरिका ने क़ेश्म द्वीप पर ड्रोन नियंत्रण केंद्र को निशाना बनाया। ईरान ने कुवैत और बहरीन में अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए। |
7 मई 2026 | अमेरिका ने बंदर अब्बास और क़ेश्म द्वीप पर हमले किए। |
7-8 अप्रैल 2026 | पाकिस्तान की मध्यस्थता में दो सप्ताह के युद्धविराम पर सहमति बनी। |
28 फरवरी 2026 | अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ संयुक्त युद्ध शुरू किया। पहले दिन सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हुई। |
वर्तमान में कतर और पाकिस्तान इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए मध्यस्थता कर रहे हैं। ईरान ने अमेरिका के सामने एक प्रस्ताव रखा है। इसमें अमेरिका से जमी हुई ईरानी संपत्तियों (Frozen Assets) को जारी करने, समुद्री नाकेबंदी और प्रतिबंधों को समाप्त करने तथा लेबनान और गाजा सहित सभी मोर्चों पर लड़ाई रोकने की मांग की गई है।
इसके बदले ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने और अपने परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत करने के लिए तैयार है। ईरान ने समझौते को लागू करने की अवधि सात दिनों से घटाकर दो दिन करने का प्रस्ताव भी दिया है।
रिपोर्टों के अनुसार, इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अमेरिका के मध्यावधि चुनावों के बाद ट्रंप पर नए हमले करने का दबाव बना रहे हैं। दूसरी ओर, ट्रंप का कहना है कि युद्ध जल्द ही किसी न किसी तरह समाप्त होगा।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने अप्रैल 2026 में अपनी वैश्विक आर्थिक वृद्धि का अनुमान घटाकर 3.1 प्रतिशत कर दिया था। आईएमएफ ने चेतावनी दी थी कि यदि लंबे समय तक युद्ध जारी रहता है और तेल की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती है, तो वैश्विक आर्थिक विकास दर लगभग 2 प्रतिशत तक गिर सकती है।

इससे वैश्विक मंदी (Global Recession) का खतरा बढ़ सकता है। यदि संघर्ष अगले कई महीनों तक जारी रहता है, तो ऊर्जा और उर्वरकों की ऊंची कीमतें कमजोर अर्थव्यवस्थाओं को मंदी की ओर धकेल सकती हैं। साथ ही, दुनियाभर में महंगाई बढ़ने की आशंका भी है।
क्लैट 2027 की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों को इस विषय से जुड़े निम्नलिखित महत्वपूर्ण तथ्यों और कानूनी प्रावधानों को याद रखना चाहिए।
युद्ध की शुरुआत (Conflict Timeline): अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी 2026 को ईरान के खिलाफ संयुक्त सैन्य कार्रवाई शुरू की।
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz): यह फारस की खाड़ी को अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण जलमार्ग है।
आर्थिक प्रभाव (Economic Impact): तेल और एलएनजी की आपूर्ति बाधित होने से ईंधन, उर्वरक और खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं।
महत्वपूर्ण शब्द (Important Terms): जेसीपीओए (JCPOA), आईएईए (IAEA), नौसैनिक नाकेबंदी (Naval Blockade), चोकपॉइंट (Chokepoint), यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves)।
अंतरराष्ट्रीय कानून (International Law): संयुक्त राष्ट्र चार्टर (UN Charter) का अनुच्छेद 2(4) बल प्रयोग पर प्रतिबंध लगाता है, जबकि अनुच्छेद 51 आत्मरक्षा के अधिकार को मान्यता देता है।
समुद्री कानून (UNCLOS): समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (United Nations Convention on the Law of the Sea) अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्यों में पारगमन मार्ग (Transit Passage) का प्रावधान करता है। ईरान ने इस संधि पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन इसका अनुमोदन नहीं किया है। अमेरिका इस संधि का पक्षकार नहीं है।
भारत का रुख (India's Position): भारत ने संयम, कूटनीति और होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षित नौवहन की आवश्यकता पर जोर दिया है।
भारत की ऊर्जा निर्भरता (Energy Dependence): भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85 प्रतिशत से अधिक आयात करता है।
वैश्विक तेल आपूर्ति (Global Oil Supply): सामान्य परिस्थितियों में प्रतिदिन लगभग 2 करोड़ बैरल तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है।
आईएमएफ का अनुमान (IMF Forecast): अप्रैल 2026 के अनुमान के अनुसार, वर्ष 2026 में वैश्विक आर्थिक विकास दर 3.1 प्रतिशत रहने की संभावना जताई गई थी।
क्लैट के महत्वपूर्ण विषय (CLAT Focus Areas): अंतरराष्ट्रीय संबंध, अंतरराष्ट्रीय कानून, ऊर्जा सुरक्षा, भारत की विदेश नीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर युद्ध का प्रभाव।
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