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सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर, 2026 को एक ऐसा फैसला दिया, जिसका महत्व अदालत तक सीमित नहीं है। कोर्ट ने इंटरनेट तक पहुंचने और उसका उपयोग करने के अधिकार को अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी। कोर्ट ने यह विचार भी खारिज कर दिया कि ऑनलाइन दुर्व्यवहार से बच्चों को बचाने के लिए उनके इंटरनेट उपयोग पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा देना उचित समाधान है।
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क्लैट 2027 की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए यह घटनाक्रम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। क्लैट 2027 के कानूनी तर्कशक्ति (Legal Reasoning) और समसामयिक घटनाओं (Current Affairs) खंड में अक्सर हाल के संवैधानिक फैसलों से जुड़े प्रश्न पूछे जाते हैं। यह फैसला दो महत्वपूर्ण मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 19 और 21) को तकनीक, बाल संरक्षण और राज्य के नियमन से जोड़ता है। इसलिए क्लैट 2027 की परीक्षा में इस विषय से संबंधित प्रश्न या गद्यांश पूछे जाने की संभावना को ध्यान में रखते हुए इसकी प्रमुख बातें समझना उपयोगी होगा।
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न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री (Child Sexual Exploitation and Abuse Material - CSEAM) के प्रसार से जुड़ी चिंताओं पर विचार करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने बच्चों के इंटरनेट उपयोग पर उम्र के आधार पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के विचार को खारिज कर दिया।
क्या हुआ: भारत के सुप्रीम कोर्ट ने ऑनलाइन बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री (CSEAM) के प्रसार से जुड़ी चिंताओं पर सुनवाई की।
मुख्य चिंता क्या थी: बच्चों को ऑनलाइन दुर्व्यवहार से कैसे बचाया जाए, बिना उन्हें इंटरनेट से पूरी तरह दूर किए?
कोर्ट ने क्या कहा: बच्चों को इंटरनेट का उपयोग करने का अधिकार है और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए इस अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए।
कोर्ट ने किस दृष्टिकोण का समर्थन किया: उचित सुरक्षा उपाय, माता-पिता का मार्गदर्शन और हानिकारक सामग्री के विरुद्ध अधिक प्रभावी कार्रवाई।
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऑनलाइन दुर्व्यवहार की समस्या का समाधान बच्चों के इंटरनेट उपयोग पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना नहीं है।
इंटरनेट आज शिक्षा, सूचना, संचार और रचनात्मक अभिव्यक्ति का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। बच्चों को इससे पूरी तरह दूर करने से वे इन सुविधाओं और अवसरों से भी वंचित हो सकते हैं।
दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों के लिए यह मुद्दा अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि डिजिटल प्लेटफॉर्म कई बार उन शैक्षिक अवसरों तक पहुंचने का एकमात्र माध्यम होते हैं, जो अन्यथा उपलब्ध नहीं होते।
चूंकि इंटरनेट तक पहुंच को अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(a) के साथ जोड़कर देखा गया है, इसलिए इस पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों का उचित आधार होना चाहिए। सभी बच्चों पर एक समान प्रतिबंध लगाना उचित नहीं माना जा सकता।
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2025 के प्रज्ञा प्रसून बनाम भारत संघ (Pragya Prasun v. Union of India) मामले में दिए गए फैसले से भी जुड़ता है, जिसमें डिजिटल दुनिया तक पहुंच को जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा माना गया था।
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भारतीय संविधान में इंटरनेट के अधिकार के नाम से कोई अलग अनुच्छेद नहीं है। हालांकि, न्यायालयों ने मौजूदा मौलिक अधिकारों की व्याख्या के माध्यम से इंटरनेट तक पहुंच के अधिकार को संरक्षण प्रदान किया है।
अनुच्छेद | अर्थ और इंटरनेट तक पहुंच से संबंध |
अनुच्छेद 14 | कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है। डिजिटल प्रणालियों के माध्यम से किसी व्यक्ति को अनुचित रूप से वंचित किए जाने की स्थिति में यह प्रासंगिक है। |
अनुच्छेद 19(1)(a) | वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। इसमें इंटरनेट पर विचार व्यक्त करना और जानकारी साझा करना भी शामिल है। |
अनुच्छेद 19(1)(g) | किसी भी पेशे को अपनाने या व्यवसाय करने की स्वतंत्रता देता है। इसमें इंटरनेट के माध्यम से किए जाने वाले पेशे और व्यवसाय भी शामिल हो सकते हैं। |
अनुच्छेद 19(2) | सार्वजनिक व्यवस्था और राज्य की सुरक्षा जैसे निर्दिष्ट आधारों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है। |
अनुच्छेद 21 | जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है। न्यायालयों ने डिजिटल दुनिया तक पहुंच को भी इस अधिकार के संरक्षण से जोड़ा है। |
अनुच्छेद 21A | छह से चौदह वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करता है। ऑनलाइन शिक्षा तक पहुंच के संदर्भ में यह प्रासंगिक है। |
इंटरनेट तक पहुंच के अधिकार से संबंधित कानूनी स्थिति कई वर्षों में विकसित हुई है। अलग-अलग न्यायिक फैसलों ने इस विषय के विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट किया है। फहीमा शिरीन मामले में शिक्षा और निजता को अनुच्छेद 21 से जोड़ा गया था। इस फैसले को केवल अनुच्छेद 21A के तहत दिया गया फैसला बताना सही नहीं होगा।
मामला | प्रमुख फैसला |
फहीमा शिरीन आर.के. बनाम केरल राज्य (Faheema Shirin R.K. v. State of Kerala), 2019 | केरल हाई कोर्ट ने कॉलेज छात्रावास में इंटरनेट उपयोग पर लगाए गए प्रतिबंधों की समीक्षा करते हुए इंटरनेट तक पहुंच को अनुच्छेद 21 के तहत शिक्षा और निजता से जोड़ा। |
अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (Anuradha Bhasin v. Union of India), 2020 | सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यवसाय करने के अधिकार को अनुच्छेद 19(1)(a) तथा अनुच्छेद 19(1)(g) के संदर्भ में संरक्षण प्रदान किया। |
प्रज्ञा प्रसून बनाम भारत संघ और अमर जैन बनाम भारत संघ (Pragya Prasun v. Union of India and Amar Jain v. Union of India), 2025 | सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल दुनिया तक पहुंच को अनुच्छेद 21 से जोड़ा और डिजिटल सत्यापन प्रक्रियाओं को अधिक सुलभ बनाने के लिए बदलाव करने के निर्देश दिए। |
जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस बनाम एस. हरिश (Just Rights for Children Alliance v. S. Harish), अक्टूबर 2026 | इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों सहित इंटरनेट तक पहुंचने और उसका उपयोग करने के अधिकार को स्पष्ट रूप से मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी। |
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यह फैसला क्लैट 2027 के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें संवैधानिक अधिकारों को डिजिटल नियमन से जुड़े नए सवालों के साथ जोड़ा गया है।
अनुच्छेद 19(1)(a): वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है।
बच्चों के अधिकार: बच्चों को भी संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। केवल उनकी कम उम्र के आधार पर उन्हें इंटरनेट तक पहुंच से पूरी तरह वंचित करना उचित समाधान नहीं है।
आनुपातिकता का सिद्धांत (Principle of Proportionality): डिजिटल पहुंच पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध उचित होने चाहिए और आवश्यक सीमा से अधिक नहीं होने चाहिए।
डिजिटल सुरक्षा: ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बच्चों की सुरक्षा के लिए अधिक प्रभावी उपाय लागू करने की आवश्यकता हो सकती है।
CSEAM: यह फैसला ऑनलाइन बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री की पहचान करने और उसके प्रसार को रोकने के प्रयासों से संबंधित है।
क्लैट 2027 के सामान्य ज्ञान और समसामयिक घटनाओं (GK and Current Affairs) खंड की तैयारी करते समय इस मामले को पढ़ना उपयोगी है। इससे अभ्यर्थियों को यह समझने में मदद मिलेगी कि तकनीक के विकास के साथ मौलिक अधिकारों की व्याख्या कैसे बदलती है और डिजिटल युग में स्वतंत्रता, निजता, बाल सुरक्षा तथा राज्य के नियमन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है।
क्लैट 2027 के अभ्यर्थी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं की जानकारी बढ़ाने तथा सामान्य ज्ञान एवं समसामयिक घटनाओं की तैयारी मजबूत करने के लिए निम्नलिखित विषय भी पढ़ सकते हैं।
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